नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें तमिलनाडु सरकार की कल्याणकारी योजनाओं में किसी जीवित व्यक्ति के नाम, पूर्व मुख्यमंत्रियों की तस्वीरें, वैचारिक नेताओं के फोटो और पार्टी चिन्हों के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश संविधान के तहत सरकार की अभिव्यक्ति की आजादी और योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के अधिकार का उल्लंघन करता है। कोर्ट के फैसले से डीएमके सरकार को बड़ी राहत मिली है। इस फैसले पर डीएमके के प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी योजना का मुख्यमंत्री के नाम पर घोषित होना सामान्य बात है। विपक्ष सिर्फ इसलिए इन योजनाओं को रोकना चाहता है क्योंकि ये किसी व्यक्ति के नाम से जुड़ी हैं। लेकिन जनता को इससे फर्क नहीं पड़ता, वो एआईएडीएमके को तो वैसे भी वोट नहीं देगी। एलंगोवन ने आरोप लगाया कि एआईएडीएमके केवल राजनीति कर रही है, जबकि डीएमके सरकार लोगों के लिए काम कर रही है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक आदेश देते हुए कहा था कि तमिलनाडु सरकार किसी भी सरकारी योजना में जीवित नेताओं के नाम या फोटो का इस्तेमाल नहीं कर सकती। कोर्ट ने यह भी कहा था कि पार्टी चिन्ह और वैचारिक नेताओं की छवियां योजनाओं में न दिखाई जाएं क्योंकि इससे जनता में पक्षपात का संदेश जा सकता है। हाईकोर्ट के फैसले को डीएमके सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि किसी योजना को प्रचारित करने का सरकार को संवैधानिक अधिकार है और अगर योजना किसी नेता के नाम पर है तो यह कोई असंवैधानिक बात नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी योजनाओं के प्रचार पर रोक लगाना न केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन होगा बल्कि इससे योजनाओं की जानकारी आम जनता तक पहुंचाने में भी रुकावट आएगी। इसलिए हाईकोर्ट का आदेश निरस्त किया जाता है।
11 अगस्त से मेरी अदालत में अर्जेंट सुनवाई नहीं: CJI
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई ने कहा कि 11 अगस्त से उनकी अदालत में सीनियर वकील अर्जेंट सुनवाई की मांग नहीं कर सकते। हालांकि जूनियर वकीलों को इससे छूट दी गई है।गवई ने कहा- कम से कम मेरी अदालत में तो इसका पालन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बाकी जस्टिस को भी इस प्रथा को अपनाना चाहिए।आमतौर पर वकील दिन की कार्यवाही की शुरुआत में अर्जेंसी का हवाला देकर जस्टिस के सामले केस की तत्काल सुनवाई की मांग करते हैं। इससे पहले से लिस्टेड मामले छूट जाते हैं।
कितने अनाथ बच्चे शिक्षा से वंचित? सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से मांगा आंकड़ा
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक मामले में सुनवाई के दौरान सभी राज्यों को अहम निर्देश दिए। इसके तहत कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिए कि वे उन अनाथ बच्चों का सर्वे करें, जिन्हें शिक्षा का अधिकार कानून 2009 (आरटीई एक्ट) के तहत फ्री और अनिवार्य शिक्षा नहीं मिली है। ये आदेश न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें अनाथ बच्चों की देखभाल और उनके संरक्षण की मांग की गई थी। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें उन अनाथ बच्चों का सर्वे करें जिन्हें स्कूलों में प्रवेश मिल चुका है और जिनको अब तक प्रवेश नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि जिन बच्चों को पढ़ाई का अधिकार नहीं मिला, उनके साथ ऐसा क्यों हुआ, यह भी बताया जाए। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा गया कि वो 2027 की जनगणना में अनाथ बच्चों के आंकड़े भी शामिल करने पर विचार करे।

