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मानवाधिकार दिवस केवल एक ऐतिहासिक घोषणा का स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन के अनुभवों पर चिंतन करने का एक निमंत्रण है: डॉ. पी.के. मिश्र

by Gujarat Vaibhav News Desk
December 10, 2025
in राष्ट्र वैभव
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  • ‘रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं को सुनिश्चित करना – सार्वजनिक सेवाएं और सभी के लिए गरिमा’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्र ने आज नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया, जिसका विषय था “रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं सुनिश्चित करना – सार्वजनिक सेवाएं और सभी के लिए गरिमा”। अपने मुख्य भाषण में उन्होंने भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के लिए विश्व मानवाधिकार दिवस के महत्व पर बल दिया, जहां संवैधानिक आदर्श, लोकतांत्रिक संस्थाएं और सामाजिक मूल्य मानव गरिमा की रक्षा और संवर्धन के लिए एकजुट होते हैं। उन्होंने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) के अनुच्छेद 25(1) के बारे में बताया, जो भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा देखभाल, सामाजिक सेवाओं और संकट के समय सुरक्षा सहित पर्याप्त जीवन स्तर के अधिकार की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार दिवस केवल एक स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में गरिमा पर चिंतन करने का एक निमंत्रण है। इस वर्ष का विषय, “मानवाधिकार, हमारी रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं”, राज्य के साथ नागरिकों के संबंधों को आकार देने में सार्वजनिक सेवाओं और संस्थाओं की भूमिका को उजागर करता है। डॉ. मिश्र ने सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र (यूडीएचआर) को आकार देने में भारत की ऐतिहासिक भूमिका, विशेष रूप से डॉ. हंसा मेहता के योगदान को याद किया, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि घोषणापत्र में “सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं” की पुष्टि हो, जो महिला-पुरूष आधारित समानता की दिशा में एक निर्णायक कदम था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अधिकारों को भोजन, पानी, आवास, शिक्षा और न्याय तक पहुंच के माध्यम से साकार किया जाना चाहिए। मानवाधिकारों की सोच नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से विकसित होकर सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को शामिल करती है, और अब प्रौद्योगिकी, डिजिटल प्रणालियों, पर्यावरणीय चिंताओं और नई कमजोरियों तक विस्तारित हो गई है। उन्होंने कहा कि आज गरिमा न केवल स्वतंत्रता से बल्कि निजता, आवागमन, स्वच्छ पर्यावरण और डिजिटल समावेशन तक पहुंच से भी निर्धारित होती है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यतागत विचारधारा ने लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में गरिमा और कर्तव्य को सर्वोच्च स्थान दिया है। धर्म, न्याय, करुणा और सेवा जैसी अवधारणाओं ने उचित आचरण और कल्याण पर बल दिया, जबकि अहिंसा ने संयम को बढ़ावा दिया और वसुधैव कुटुंबकम ने व्यापक मानव परिवार से जुड़ाव की भावना पर जोर दिया। इन सिद्धांतों ने संविधान के निर्माण को प्रभावित किया, जिसमें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और लागू करने योग्य अधिकारों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और कल्याण को प्राथमिकता देने वाले निर्देशक सिद्धांत शामिल हैं।

2014 से पूर्व के दशक पर विचार करते हुए, डॉ. मिश्र ने कहा कि भारत ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, एमजीएनआरईजीए और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से विकास के लिए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को अपनाया। हालांकि, प्रभावी कार्यान्वयन के बिना अधिकारों को लागू करने से विश्वसनीयता कम हो गई। 2014 से, सरकार ने एक व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोई भी पात्र लाभार्थी छूट न जाए। यह “कागजी अधिकारों” से “कार्यान्वित अधिकारों” की ओर एक बदलाव का प्रतीक है, जिसे डिजिटल इंफ्रास्‍टक्‍चर, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और विकसित भारत संकल्प यात्रा जैसे जागरूकता अभियानों का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गरीबी उन्मूलन मानवाधिकार का सबसे प्रभावी क्रियाकलाप है, जिसके तहत पिछले दशक में 25 करोड़ भारतीयों को गरीबी से बाहर निकाला गया है, जिसकी पुष्टि घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 से होती है।

डॉ. मिश्र ने दैनिक आवश्यकताओं की सुरक्षा के चार स्तंभों की रूपरेखा प्रस्तुत की। पहला स्तंभ, घर में सम्मान, आवास, जल, स्वच्छता, बिजली और स्वच्छ ईंधन के माध्यम से मजबूत हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत अभियान, सौभाग्य और उज्ज्वला योजना ने लोगों के जीवन में बदलाव लाया है। दूसरा स्तंभ, सामाजिक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना ने कोविड-19 के दौरान 80 करोड़ लोगों को भोजन उपलब्ध कराया और आयुष्मान भारत (पीएमजेएवाई) ने 42 करोड़ नागरिकों को कवर किया। बीमा, पेंशन और नए श्रम कानूनों ने अनौपचारिक और गिग कामगारों को लाभ पहुंचाया, जबकि मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम जैसे सुधारों ने कमजोर समूहों के लिए सम्मान सुनिश्चित किया। तीसरा स्तंभ, समावेशी आर्थिक विकास, वित्तीय समावेशन और सशक्तिकरण के माध्यम से आगे बढ़ा। जेएएम ट्रिनिटी ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण में क्रांति ला दी, 56 करोड़ से अधिक जन धन खातों ने बैंकिंग सुविधाओं से वंचित लोगों को औपचारिक वित्त से जोड़ा, और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और प्रधानमंत्री स्वनिधि जैसी योजनाओं ने उद्यम निर्माण को सक्षम बनाया। स्वयं सहायता समूहों, लखपति दीदियों, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और विधानसभाओं में ऐतिहासिक एक-तिहाई आरक्षण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया गया। न्याय और कमजोर समुदायों के संरक्षण का चौथा स्तंभ, नए आपराधिक कानून संहिताओं, त्वरित न्यायालयों, पीओसीएसओ अधिनियम, विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम और आदिवासी समुदायों के लिए पीएम-जनमान अधिनियम के माध्यम से मजबूत किया गया। वैक्सीन मैत्री सहित मानवीय सहायता, मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता में भारत के विश्वास को दर्शाती है।

प्रधानमंत्री के जन भागीदारी के आह्वान से प्रेरित होकर, सार्वजनिक सेवा वितरण में निर्देश देने के बजाय प्रतिक्रिया देने, योजनाओं को लागू करने के बजाय गरिमा प्रदान करने और लोगों को लाभार्थी के बजाय राष्ट्र निर्माण में भागीदार के रूप में देखने का दृष्टिकोण विकसित हुआ है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत का चुनाव लोकतांत्रिक संस्थाओं और समावेशी विकास में वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।

भारत के विकसित भारत 2047 की दिशा में आगे बढ़ने के साथ-साथ उभरती चुनौतियों के लिए ढांचे को अनुकूलित करने हेतु राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से आग्रह करते हुए, श्री मिश्र ने जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय न्याय, डेटा संरक्षण, एल्गोरिथम निष्पक्षता, जिम्मेदार एआई, गिग वर्क की कमजोरियां और डिजिटल निगरानी को अत्यावश्यक चिंताओं के रूप में उजागर किया।

अंत में, डॉ. मिश्र ने इस बात पर जोर दिया कि सुशासन स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जिसे दक्षता, पारदर्शिता, शिकायत निवारण और समय पर सेवा वितरण द्वारा परिभाषित किया जाता है। उन्होंने एक आधुनिक, समावेशी राष्ट्र की कल्पना की, जिसमें रहने योग्य शहर और जीवंत गांव हों, और सभी के लिए गरिमा, न्याय और विकास सुनिश्चित करने के लिए नागरिक-केंद्रित शासन, प्रौद्योगिकी का जिम्मेदारीपूर्वक इस्‍तेमाल और सामूहिक कार्रवाई पर बल दिया।

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