उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जन्मी और अहमदाबाद को अपना दूसरा घर बनाने वाली रजनी धीमान साहित्य के क्षेत्र में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से समाज की संवेदनाओं उनकी तकलीफों और संघर्ष को शब्दों में उकेरकर सभी को झकजोर देती हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित रजनी धीमान ने अपने इस कविता संग्रह ‘मेरे सैनिक तुम्हे नमन’ में देश के सैनिकों के जीवन को छोटी-छोटी कविता द्वारा जिस ढंग से उभारा है वह काबिले तारीफ है। गत दिवस ‘साहित्यालोक’ संस्था के वार्षिक समारोह में रजनी धीमान की नई पुस्तक ‘मेरे सैनिक तुम्हें नमन’ का विमोचन हुआ। पुस्तक में कुल 74 कविताएं शामिल हैं। हर कविता भले छोटी हो लेकिन उसके शब्दों में गहराई, संवेदना, संघर्ष, अकेलापन, घर, आंगन, खेत, खलिहान, परिवार, रिश्तेदार और समाज का ऐसा सुन्दर मिश्रण है जो सुखद भी है और सोचने को विवश भी करता है। पुस्तक की पहली कविता ‘वापस आना’, पढक़र आंख भर आती है। ‘तिरंगे में लिपट के सोना है’ कविता देशभक्ति का जीता-जागता उदाहरण है। पुस्तक की एक अन्य कविता ‘सवाल नहीं करते’ में देश की सीमाओं में डटे सैनिकों की दिनचर्या का वह हिस्सा दर्शाती है जहां सैनिक कई जरूरतों से मशरूफ रहता है फिर भी देश के लिए प्राण-न्योछावर के लिए तत्पर रहता है। पुस्तक की हर कविता अपने आप में बेजोड़ है। रजनी धीमान ने कविताओं में सैनिकों के जीवन के हर हिस्से को छुआ है। इसके लिए वह बधाई की पात्र हैं। पुस्तक की शुभाशंसा आईएएम अहमदाबाद में सहायक महाप्रबंधक (हिन्दी) डॉ. मुकेश शर्मा ने बहुत भी शानदार तरीके से लिखी है। इतनी सुन्दर और सरल तरीके से लिखी गई शुभाशंसा शायद इतनी असरदार इसलिए है क्योंकि डॉ. शर्मा अपने जीवन के 20 साल वायुसेना को समर्पित कर चुके हैं। वडोदरा के वरिष्ठ साहित्यकार क्रांति (येवतीकर) कनाटे द्वारा पुस्तक की प्रस्तावना में रजनी धीमान की पहली पुस्तक बेटी हिन्दुस्तान की, से बात शुरू करते हुए दूसरी पुस्तक ‘मेरे सैनिक तुम्हें नमन’ के बारे में अपने विचार-साझा किए, वह प्रशंसनीय होने के साथ नए कवियों को इस प्रकार के लेखन को प्रोत्साहित करते हैं। कुल मिलाकर रजनी धीमान की पुस्तक ‘मेरे सैनिक तुम्हे नमन’ हर किसी को अवश्य पढऩा चाहिए। हम अगर सकुन और सुरक्षित जीवन जी रहे हैं तो इसके पीछे हमारे सैनिकों का त्याग-बलिदान, संघर्ष शामिल है।

