कई काव्य-संग्रह, बाल साहित्य की रचयिता और संपादन में निपुण मंजु महिमा की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 77 साल की हो चुकीं मंजु महिमा आज भी जोश-खरोश के साथ लेखन में जुटी हैं। इसका ताजा उदाहरण है गत दिवस ‘साहित्यालोक’ के वार्षिक समारोह में उनके उपन्यास ‘कौडिय़ां और कंचे’ का विमोचन। 31 कडिय़ों में लिखे गए उपन्यास ‘कौडिय़ां और कंचे’ में ग्रामीण परिवेश में पात्रों की सोच, इच्छा, हंसी-ठिठोली, गुस्सा, स्नेह आदि का चित्रण साहित्य की हर विधा में लिखना वाकई बहुत बड़ी चुनौती होती है लेकिन मंजु महिमा को ऐसी चुनौतियों से अपनी लेखनी से पार पाने की आदत है। बाल साहित्य से लेकर काव्यधारा से उनका अटूट रिश्ता है। अनेकों पुरस्कार से पुरस्कृत मंजु महिमा राजस्थान के कोटा में जन्मी, शिक्षा-दीक्षा उन्होंने झीलों की नगरी उदयपुर से पाई, तत्पश्चात गुजरात के अहमदाबाद को कर्मस्थली बनाया। उपन्यास को लेखिका ने पुराने और नऐ-पुराने जमाने को दही और शक्कर की लस्सी बनाकर प्रस्तुत किया वह काफी प्रशंसनीय तो है लेकिन इसमें छुपा संदेश प्रेरणादायक है। मंजु महिमा ने उपन्यास में अपने शब्दों की माला को जिस तरह पिरोया है लगता है सबकुछ हमारे आसपास का हिस्सा है। आज की आधुनिक तकनीक के बीच कागज पर उकेरे गए शब्द आज भी उतने प्रासंगिक हैं जो बीते समय में थे। पाठकों को यह उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगेगा जैसे इस कहानी के पात्र वह स्वयं हैं। उपन्यास ‘कौडिय़ों और कंचे’ के लिए मंजु महिमा को ढेर सारी बधाई, शुभकामनाएं।

