एक साधारण ‘बांकड़े’ के माध्यम से सहकारिता पुरुष ने साझा किया जीवन का गहन दर्शन
अहमदाबाद/गांधीनगर
भारतीय सहकारिता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर और प्रमुख राजनेता दिलीप संघानी ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक अत्यंत मार्मिक और अर्थपूर्ण संदेश साझा किया है। एक सार्वजनिक स्थान पर रखे ‘बेंच’ (बांकड़ा) पर लिखे शब्दों के माध्यम से उन्होंने राजनीति और समाज सेवा में लगे कार्यकर्ताओं के लिए एक नई वैचारिक दिशा निर्धारित की है।
संघानी जी ने गुजराती में ट्वीट करते हुए लिखा: एक बेंच पर लिखा अर्थपूर्ण लेखन: विराम क्षणिक है, जनसेवा का संकल्प आजीवन है।)
विराम केवल ऊर्जा संचय के लिए, रुकने के लिए नहीं
दिलीप संघानी का यह कथन उस समय आया है जब सार्वजनिक जीवन में थकान और ठहराव की बातें अक्सर सुनी जाती हैं। उनके इस संदेश का गहरा निहितार्थ यह है कि समाज सेवा के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए ‘विराम’ या ‘विश्राम’ केवल एक छोटा सा पड़ाव है। जैसे एक राहगीर बेंच पर बैठकर अपनी थकान मिटाता है ताकि वह आगे की लंबी यात्रा तय कर सके, वैसे ही एक जनसेवक के लिए आराम केवल नई ऊर्जा संचय करने का माध्यम है।
लेख के माध्यम से संघानी जी ने स्पष्ट किया है कि “जनसेवा” कोई अंशकालिक कार्य या शौक नहीं है, बल्कि यह एक “आजीवन संकल्प” है। उनके अनुसार: पद आते-जाते रहते हैं, लेकिन सेवा का भाव स्थायी होना चाहिए। व्यक्तिगत थकान गौण है, समाज का हित सर्वोपरि है। विश्राम की स्थिति अस्थायी है, जबकि सेवा का कर्तव्य मृत्युपर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है।
दिलीप संघानी के इस ट्वीट ने इंटरनेट पर एक सकारात्मक बहस छेड़ दी है। उनके समर्थकों और युवा कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन जीने की एक ‘गाइडबुक’ है। विशेष रूप से सहकारिता क्षेत्र से जुड़े लोग इसे संघानी जी के स्वयं के जीवन का प्रतिबिंब मान रहे हैं, जिन्होंने दशकों से बिना थके किसानों और आम जनता के उत्थान के लिए कार्य
किया है।
दिलीप संघानी का यह छोटा सा दिखने वाला “बांकड़ा दर्शन” वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग की याद दिलाता है। यह संदेश समाज के हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो परिवर्तन लाना चाहता है। यह याद दिलाता है कि जब लक्ष्य बड़ा हो, तो शरीर को थोड़ा विश्राम दिया जा सकता है, लेकिन संकल्प को कभी भी विराम नहीं मिलना चाहिए।

