उम्मीदवारों की याचिका खारिज
नई दिल्ली
खुद को बौद्ध बता कर मेडिकल पीजी में अल्पसंख्यक आरक्षण मांग रहे 2 उम्मीदवारों को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने इसे ‘नए किस्म की धोखाधड़ी’ कहा. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह टिप्पणी तब की जब उसे जानकारी मिली कि लिखित परीक्षा से पहले इन उम्मीदवारों ने खुद को सामान्य वर्ग का बताया था और दोनों हरियाणा की समृद्ध जाट जाति से हैं. कोर्ट ने हरियाणा सरकार से भी इस मामले में कड़े सवाल किए हैं.मेरठ के सुभारती मेडिकल कॉलेज को बौद्ध अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षण दिया जाता है. निखिल कुमार पुनिया और एकता ने सुभारती मेडिकल कॉलेज में नीट पीजी कोर्स में अपने लिए सीट की मांग की है. उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का दावा करते हुए एसडीओ (सब डिविजनल ऑफिसर) कार्यालय से जारी प्रमाण पत्र भी पेश किया था.खुद भी हरियाणा से आने वाले चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, ‘पुनिया उपनाम जाट भी लिखते हैं और अनुसूचित जाति के लोग भी. आप कौन से पुनिया हैं?’ वकील ने जवाब दिया कि उनके मुवक्किल जाट हैं. इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा कि वह अल्पसंख्यक कैसे हो गए? वकील ने कहा कि उन्होंने धर्म परिवर्तन किया है. यह उनका संवैधानिक अधिकार है.वकील की बात पर सीजेआई ने टिप्पणी की, ‘वाह! यह तो धोखाधड़ी का एक नया तरीका है. आप वास्तविक अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनना चाहते हैं. आप सबसे समृद्ध, सुविधासंपन्न और उच्च जाति समुदायों में से एक से हैं. इस समुदाय के पास कृषि भूमि है. सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं. आपको उन लोगों के अधिकार नहीं छीनने चाहिए, जो वास्तव में वंचित हैं. ‘बेंच के सदस्य जस्टिस जोयमाल्या बागची ने भी याचिकाकर्ता की दलील पर कड़ा एतराज जताया. इसके बाद कोर्ट ने अल्पसंख्यक उम्मीदवार के रूप में प्रवेश की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं का आवेदन खारिज कर दिया. इसके बाद कोर्ट ने हरियाणा सरकार से पूरे घटनाक्रम पर जवाब मांग लिया. कोर्ट ने राज्य सरकार से 2 सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.
काम करने के बजाय हवा में महल बना रहे, आवारा कुत्तों के खतरे पर राज्यों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार
आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और कोर्ट के आदेशों के पालन में ढिलाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। बुधवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें जमीनी काम करने के बजाय हवा में महल बना रही हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ हलफनामे और दावे काफी नहीं हैं, बल्कि ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए। कोर्ट पहले ही राज्यों को आवारा कुत्तों की नसबंदी क्षमता बढ़ाने, एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) सेंटर मजबूत करने और सड़कों से आवारा जानवर हटाने के निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद जब राज्यों ने अपनी प्रगति रिपोर्ट रखी, तो पीठ ने असंतोष जताया। न्यायाधीशों ने कहा कि कई राज्यों की बातें स्टोरीटेलिंग जैसी हैं, जिनका जमीन पर असर नजर नहीं आता। कोर्ट ने असम के आंकड़ों पर खास चिंता जताई। 2024 में वहां 1.66 लाख डॉग बाइट और 2025 में सिर्फ जनवरी में ही करीब 20,900 मामले सामने आए। अदालत ने इसे “चौंकाने वाला” बताया।. वहीं, झारखंड के आंकड़ों ने तो कोर्ट को गुस्से से भर दिया. झारखंड सरकार ने दावा किया कि उन्होंने 1.89 लाख कुत्तों की नसबंदी की है. कोर्ट ने जब गहराई से देखा तो पता चला कि इसमें से 1.6 लाख नसबंदी सिर्फ 2 महीने में दिखाई गई है. कोर्ट ने इसे पूरी तरह फर्जी आंकड़ा करार दिया है. जजों ने पूछा कि एक गाड़ी में एक दिन में कितने कुत्ते पकड़े जा सकते हैं. झारखंड के इन आंकड़ों को कोर्ट ने पूरी तरह मनगढ़ंत बताया है.

