मुंबई
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में जहाँ युवाओं पर हर वक्त बेहतर प्रदर्शन करने और उम्मीदों पर खरा उतरने का भारी मानसिक दबाव रहता है, वहीं एनकोर हेल्थकेयर की डायरेक्टर (डोमेस्टिक मार्केटिंग) राधिका अंबानी ने इस विषय पर एक बेहद व्यावहारिक और प्रेरणादायक दृष्टिकोण साझा किया है। हाल ही में छात्रों के एक समूह के साथ विशेष बातचीत में राधिका ने सफलता, विफलता, जीवन भर सीखने की ललक और फेमिनिज्म (नारीवाद) पर अपने विचार खुलकर सामने रखे। आमतौर पर एक बेहद सफल और संपन्न पृष्ठभूमि से आने वाली राधिका अंबानी ने बड़ी ही सादगी से स्वीकार किया कि वे भी कभी असफलताओं से बुरी तरह डरती थीं। उन्होंने बताया, “जब मैं 20 से 30 साल के बीच की उम्र में थी, तब मुझे असफल होने से बहुत ज्यादा डर लगता था। जब आपको लगातार समाज और आसपास के लोगों से यह सुनने को मिलता है कि आप जिंदगी में कुछ बहुत बड़ा करेंगे, तो आप फेल होने से इतना ज्यादा डरने लगते हैं कि आप कोई नया कदम उठा ही नहीं पाते।” राधिका के अनुसार, इस असमंजस और डर का समाधान उन्होंने केवल ‘आत्मविश्वास’ के इंतजार में बैठकर नहीं निकाला, बल्कि ‘काम करने’ (Action) में ढूँढा। छोटे-छोटे फैसले लेने, छोटी-छोटी जीतों को हासिल करने से उनका खुद पर भरोसा बढ़ता गया। राधिका अंबानी सफलता के पारंपरिक पैमानों (शक्ति, प्रसिद्धि और पैसा) को पूरी तरह खारिज नहीं करतीं, क्योंकि लोग इन्हें आसानी से माप सकते हैं। लेकिन उनके खुद के मापदंड बिल्कुल अलग हैं । राधिका अंबानी ने कहा, “अपने करियर के शुरुआती और अनिश्चित दिनों में, हर सुबह मैं खुद से एक ही सवाल करती थी कि क्या मैंने आज नौकरियां (रोजगार के अवसर) बढ़ाई हैं? यही मेरा मुख्य एजेंडा बन चुका था।” उनका मानना है कि आज के युवाओं को इसी सोच की सबसे ज्यादा जरूरत है। सफलता की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अपनी व्यक्तिगत होनी चाहिए, जिसमें लगातार विकास (Growth) हो, न कि इसे किसी की पहचान का एकमात्र जरिया बना दिया जाए। एक चुनौतीपूर्ण कॉर्पोरेट भूमिका निभाने और एक प्रतिष्ठित परिवार की अपेक्षाओं को संभालने के बीच, जब राधिका से फेमिनिज्म के मायने पूछे गए, तो उन्होंने एक बहुत ही गहरी बात कही । उन्होंने कहा, “हम उस दिन असल मायने में जीतेंगे जिस दिन यह सवाल सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं रह जाएगा।” राधिका ने साझा किया कि उनका पालन-पोषण और उनकी शादी दोनों ही ऐसे परिवारों में हुई है जहाँ महिलाओं का दबदबा रहा है। उनकी माँ और सास दोनों ही ऐसी मजबूत महिलाएँ हैं जिन्हें आसानी से प्रभावित या सिखाया नहीं जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि लैंगिक समानता (Gender Equality) के लिए सिर्फ महिलाओं का मजबूत होना ही काफी नहीं है। असली बदलाव और जमीनी काम तब होगा, जब महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी इस विषय पर शिक्षित और संवेदनशील बनाया जाएगा।

