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पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में ‘पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण’ विषय पर पाँच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

by Gujarat Vaibhav News Desk
May 16, 2026
in राष्ट्र वैभव
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पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में ‘पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण’ विषय पर पाँच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन
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  • भारत में भारत को मत ढूंढो, विश्व में भारत ढूंढो: श्रद्धेय आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण
  • देश की मूल संस्कृति व मूल प्रकृति को समझो: आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण
  • ‘ज्ञानभारतम्’ भारत की हस्तलिखित धरोहर हेतु एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक: श्रद्धेय आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण

16 मई 2026 हरिद्वार। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय (MoC) की मुख्य पहल “ज्ञानभारतम् मिशन” के अंतर्गत, पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में आयोजित ‘पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण’ पर पंचदिवसीय कार्यशाला पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार में आयोजित की गई। इसी क्रम में, संस्कृति, धरोहर, संरक्षण और उन्हें स्थिर करने की वैज्ञानिक विधियों पर केंद्रित रहा। कार्यक्रम में संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों, विशेषज्ञों तथा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मुख्य अतिथियों का स्वागत माला और स्मृति चिह्न भेंट करके किया गया।

इस पंचदिवसीय शृंखला के पाँचवे दिवस श्रद्धेय आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण ने ‘देश की मूल संस्कृति व मूल प्रकृति’ को समझने का उद्घोष करते हुए कहा कि जीर्ण-क्षीर्ण पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण का उद्देश्य हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है। उन्होंने रेखांकित किया कि केवल संरक्षण ही नहीं बल्कि प्राचीन पांडुलिपियों के साथ-साथ नए लेखन कार्य को भी बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने आह्वान किया कि 400–500 वर्ष पुरानी पांडुलिपियों को संशोधित एवं पुनर्संरक्षित करके उन्हें नए स्वरूप में प्रस्तुत किया जाए ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर बन सकें। साथ ही, उन्होंने ‘साक्ष्य-आधारित दस्तावेजों’ और प्रमाणों के संरक्षण पर जोर दिया, जिसमें शास्त्रीय ग्रंथों, दस्तावेजों, ‘बाबरनामा’ और ‘आईने अकबरी’ जैसे ऐतिहासिक स्रोतों का संदर्भ लेकर इतिहास की गहन समझ विकसित करने की बात कही गई। पतंजलि के प्रयासों का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने ‘साक्ष्य-आधारित इतिहास लेखन’ की दिशा में किए जा रहे कार्यों को साझा किया। उन्होंने यह भी कहा कि पांडुलिपियाँ केवल पुरातन दस्तावेज नहीं हैं अपितु वे हमारी संपदा, संस्कृति व ज्ञान का अमूल्य भंडार हैं, जिन्हें संरक्षित करना आवश्यक है। उन्होंने चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और धन्वंतरि जैसे प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए पांडुलिपियों के अध्ययन से इतिहास के छिपे हुए रहस्यों को समझाने की बात कही। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को संस्कृति-संरक्षण के मूल आधारों से सहसंबद्ध बताया और संस्कृति मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की। साथ ही, यह भी बताया कि भारत सरकार द्वारा ‘ज्ञानभारतम्’ राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण से इन ग्रंथों की पहचान, पुनर्लेखन और डिजिटल संरक्षण का कार्य प्रारंभ किया गया है। संस्कृति, धरोहर और संरक्षण ऐसे शब्द हैं, जो किसी भी देश की पहचान, इतिहास और भविष्य को जोड़ते हैं। ये संप्रत्यय हमारे अतीत को दर्शाने के साथ ही आगामी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं। संस्कृति हमें सिखाती है कि हम कौन हैं, धरोहर हमें बताती है कि हम कहाँ से आए हैं और संरक्षण सुनिश्चित करता है कि हम अपनी पहचान के साथ कहाँ जा रहे हैं। उन्होंने ‘भारतीय शिक्षा बोर्ड’ की विषयवस्तु में पांडुलिपियों को अध्याय रूप में समावेश करने की बात कहीं। उनका मानना है कि इन्हें सुरक्षित और संरक्षित रखना एक विकसित एवं जागरूक समाज की पहचान है।

वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों ने पतंजलि ‘कृषि अनुसंधान परिसर’ का अवलोकन किया। कृषि मृदा अनुसंधान की वैज्ञानिक डॉ० मनोहारी राठी ने प्रतिनिधियों को भारत में पाई जाने वाली आठ प्रमुख प्रकार की मिट्टियों, मृदा परीक्षण की प्रक्रियाओं तथा पतंजलि द्वारा विकसित ‘धरती का डॉक्टर’ ऑटोमेटेड मृदा परीक्षण मशीन के बारे में जानकारी दी। साथ ही, उन्होंने एटोमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोफोटोमेट्री, यूवी-विज़ स्पेक्ट्रोफोटोमीटर एवं फ्लेम फोटोमीटर सहित विभिन्न आधुनिक उपकरणों की कार्यप्रणाली की जानकारी दी। जीबीएम, नई दिल्ली की वरिष्ठ संरक्षक, श्रीमती अर्चना गहलोत ने अपने दीर्घकालीन प्रयोगात्मक सत्र में पांडुलिपियों के अवलोकन से संबंधित विभिन्न तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। पांडुलिपियों के संरक्षण में माइक्रोफिल्मिंग एवं फोटोग्राफिक तकनीकों की महत्ता पर बल देते हुए उन्होंने नमी से बचाव के प्रभावी उपायों का प्रायोगिक प्रदर्शन भी किया। उन्होंने बताया कि हस्तलिपियों की साज-सज्जा, बाइंडिंग तथा सुरक्षित प्रबंधन के लिए विशेष उपकरणों एवं सामग्री का उपयोग आवश्यक है। इससे पांडुलिपियों को भौतिक व प्राकृतिक क्षति, कीट-पतंगों, धूल तथा अन्य प्रभावों से सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पांडुलिपियों को जैविक क्षति से बचाना संरक्षण प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग है।

Gujarat Vaibhav News Desk

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