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पद्म पुरस्कार विजेताओं का परिचय

by Gujarat Vaibhav News Desk
May 25, 2026
in राष्ट्र वैभव
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पद्म पुरस्कार विजेताओं का परिचय
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1. प्रवीण कुमार (पैरा-हाई जम्पर)

परिचय: 15 मई, 2003 को जन्मे प्रवीण पुरुषों की T44 ऊंची कूद में विश्व के नंबर 1 पैरा-एथलीट हैं।
उपलब्धियां: टोक्यो 2020 में रजत और पेरिस 2024 पैरालंपिक में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीता। वे पैरालंपिक पदक जीतने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय हैं।
सम्मान: अर्जुन पुरस्कार (2021) और मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार (2024)।

2. तगाराम भील (लोक संगीत कलाकार)
परिचय: जैसलमेर (राजस्थान) के निवासी और थार रेगिस्तान के प्रसिद्ध अलगोजा (दोहरी बांसुरी) वादक हैं।
योगदान: स्पेन, इटली, अमेरिका सहित कई देशों में भारतीय लोक संस्कृति का प्रदर्शन किया। वर्तमान में अलगोजा लोक संगीत संस्थान के निदेशक हैं
सम्मान: महारावल गिरधर पुरस्कार (2013) और मरुधरा पुरस्कार (2018)।

3. डॉ. गोपालजी त्रिवेदी – मरणोपरांत (कृषि वैज्ञानिक)
परिचय: राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (बिहार) के पूर्व कुलपति। इनका निधन 12 मई, 2026 को हुआ।
योगदान: ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक मापन के लिए प्रसिद्ध ‘त्रिवेदी स्केले’ विकसित किया। बिहार में मत्स्य-कृषि के लिए ‘बाबा’ मॉडल दिया और शीतकालीन मक्के की उत्पादकता बढ़ाई। इन्हें ‘किसान मित्र’ कहा जाता था।
सम्मान: लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (2011) और कृषि ऋषि पुरस्कार (2015)।

4. के. विजय कुमार (पूर्व महानिदेशक, सीआरपीएफ)
परिचय: 1975 बैच के प्रख्यात आईपीएस (IPS) अधिकारी और संकटपूर्ण मिशनों के विशेषज्ञ।
मुख्य ऑपरेशन: विशेष कार्य बल (STF) के प्रमुख के रूप में कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन का अंत किया। कश्मीर में बीएसएफ आईजी के रूप में उत्कृष्ट कार्य किया।
पद: महानिदेशक (CRPF) और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार रहे। इन्होंने ‘वीरप्पन: चेजिंग द ब्रिगेंड’ पुस्तक लिखी।

5. के. पजानिवेल (सिलंबम मास्टर)
परिचय: पुदुचेरी के रहने वाले, 5000 वर्ष पुरानी भारतीय मार्शल आर्ट ‘सिलंबम’ (लाठी/शस्त्र युद्ध) के अंतरराष्ट्रीय विजेता।
योगदान: “मामल्लन सिलंबम एंड फोक आर्ट डेवलपमेंट क्लब” के माध्यम से 35 वर्षों से बच्चों को मुफ्त प्रशिक्षण दे रहे हैं। अब तक 5000 से अधिक छात्रों को सिखाया।
सम्मान: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2023) और पुथुवाई कलामामणि (2012)।

6. जनार्दन बापूराव बोथे (सामाजिक कार्यकर्ता)
परिचय: राष्ट्र संत श्री तुकडोजी महाराज के अनुयायी और उनके पूर्णकालिक व्यक्तिगत सचिव रहे।
योगदान: 1962 के युद्ध में सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए नेफा (NEFA) सीमा पर भजनों का आयोजन किया। आदिवासियों के लिए 11 स्कूल व छात्रावास खोले। वर्तमान में अखिल भारतीय श्री गुरुदेव सेवा मंडल के महासचिव हैं।
सम्मान: डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर दलित मित्र पुरस्कार (1992)।

7. तृप्ति मुखर्जी (कंथा कढ़ाई कलाकार)
परिचय: सूरी (पश्चिम बंगाल) की विश्वप्रसिद्ध कंथा कढ़ाई (Stitch) कलाकार।
योगदान: 37 वर्षों से सक्रिय हैं और प्रशिक्षण केंद्र चलाकर वंचित व बेरोजगार ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं। यूके और जापान के मेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
सम्मान: शिल्प गुरु पुरस्कार (2016) और बंगश्री पुरस्कार (2017)।

8. अंकेगौड़ा एम (ज्ञान संरक्षक)
परिचय: मांड्या (कर्नाटक) के निवासी और कन्नड़ साहित्य में स्नातकोत्तर। इन्होंने एक चीनी मिल में 32 वर्ष काम किया।
योगदान: पिछले 50 वर्षों में अपनी कमाई से विभिन्न भाषाओं की 20 लाख से अधिक पुस्तकों का विशाल संग्रह किया। अपने घर को “पुस्तकदा माने” (मुफ्त सार्वजनिक पुस्तकालय) बनाकर खुद संभालते हैं।
सम्मान: काउंटी/राज्य स्तर पर कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार (2014)।

9. मीर हाजी कासम (ढोलक वादक)
परिचय: जूनागढ़ (गुजरात) के दिग्गज पारंपरिक ढोलक वादक, जिन्हें ‘हाजी रामक्डू’ भी कहा जाता है।
योगदान: बिना औपचारिक शिक्षा के 6 दशकों से गुजराती लोक संगीत को अमेरिका, यूके और कनाडा जैसे देशों में पहचान दिलाई। गौ-शालों और गरीबों के लिए 35,000 से अधिक धर्मार्थ शो किए।
सम्मान: गुजरात गौरव पुरस्कार और गुजरात राज्य संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार।

10. एन. स्वामिनादन (तमिल संगीत/ओथुवर कलाकार)
परिचय: तमिल संगीत और भगवान शिव के प्रामाणिक भजनों के संग्रह ‘तिरुमुराई’ के शीर्षस्थ गायक (ओथुवर)।
योगदान: तिरुत्तनी मुरुगन मंदिर में 26 वर्ष सेवा की। मलेशिया, सिंगापुर और स्विट्जरलैंड में प्रस्तुतियां दीं। वर्तमान में धर्मपुरम अधीनम के थेवरापदसालाई के प्रमुख हैं।
सम्मान: तमिलनाडु सरकार द्वारा कलैमामणि पुरस्कार और ‘तिरुमुरई रत्न’ उपाधि।

11. डॉ. रामचंद्र गोडबोले (सामाजिक कार्यकर्ता व चिकित्सक)
परिचय: सतारा (महाराष्ट्र) के बीएएमएस (BAMS) डॉक्टर, जो पिछले 40 वर्षों से आदिवासी स्वास्थ्य सेवा में समर्पित हैं।
योगदान: महाराष्ट्र में 12 वर्ष और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर व अबूझमाड़ के जंगलों में 30 वर्ष तक सेवा की। बस्तर में “बनफूल” संगठन के जरिए कुपोषण पर काम किया और सुदूर वनों में 114 स्वास्थ्य शिविर लगाकर हजारों आदिवासियों का मुफ्त इलाज किया।

12. सुनीता गोडबोले (सामाजिक कार्यकर्ता)
परिचय: पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता (MSW)। छात्र जीवन में आपातकाल विरोधी आंदोलन के कारण डेढ़ महीने जेल में रहीं।
योगदान: डॉ. रामचंद्र गोडबोले से विवाह के बाद बस्तर (छत्तीसगढ़) के आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय हुईं। स्थानीय भाषाएँ (गोंडी-हल्बी) सीखकर आदिवासी महिलाओं का विश्वास जीता। इनके प्रयासों से 24 गांवों के 460 बच्चे कुपोषण मुक्त हुए। बाल अधिकार बोर्ड की सदस्य भी रहीं।
सम्मान: सेवा गौरव पुरस्कार (2001) और बाया कर्वे पुरस्कार (2017)।

13. तेची गुबिन (सेवानिवृत्त मुख्य वास्तुकार व सामाजिक कार्यकर्ता)
परिचय: अरुणाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग (APPWD) के सेवानिवृत्त मुख्य वास्तुकार।
योगदान: ‘निशी इंडिजिनस फेथ एंड कल्चरल सोसाइटी’ के माध्यम से डोनी-पोलो आस्था का संरक्षण किया। भारत की सीमाओं पर ‘सीमांत दर्शन यात्रा’ का नेतृत्व किया, जिससे सीमा चौकियों पर सुरक्षा बढ़ी। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के उपाध्यक्ष हैं।
सम्मान: ओ.एस.ई. इंडिया अवार्ड (2022) और इंडिया लीडर अवार्ड (2023)।

14. देवकी अम्मा जी (वन उत्पादक/पर्यावरणविद्)
परिचय: केरल के अलाप्पुझा की पर्यावरणविद्, जिन्हें प्यार से ‘वन दादी’ कहा जाता है।
योगदान: 1980 में कार दुर्घटना के बाद सामान्य खेती बंद होने पर बंजर तटीय भूमि पर पौधे लगाना शुरू किया। 4 दशकों में 5 एकड़ में ‘कोल्लाकल थपोवनम’ नामक गृह वन बनाया, जिसमें 3,000 से अधिक दुर्लभ व औषधीय पेड़ हैं।
सम्मान: इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (2003) और नारी शक्ति पुरस्कार (2018)।

15. शतावधानी डॉ. आर. गणेश (अवधान विशेषज्ञ व बहुश्रुत विद्वान)
परिचय: कर्नाटक के निवासी और बिना कागज-कलम के तात्कालिक काव्य चुनौतियों को हल करने वाली प्राचीन कला ‘अवधान’ के प्रकांड विद्वान।
योगदान: कन्नड़ व संस्कृत में 1,300 से अधिक अष्टावधान और 5 शतावधान किए। 10 भाषाओं के ज्ञाता हैं और ‘एकव्यक्ति-यक्षगान’ जैसे नए कला रूप दिए। 70 से अधिक पुस्तकें लिखीं।
सम्मान: राज्योत्सव पुरस्कार, साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार और महर्षि बदरायण व्यास सम्मान।

16. प्रो. वेम्पटि कुटुम्ब शास्त्री (संस्कृत विद्वान व शिक्षाविद्)
परिचय: अद्वैत वेदांत और संस्कृत काव्यशास्त्र के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित विद्वान।
पद: संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति रहे। वर्तमान में एससीएसवीएमवी, कांचीपुरम के चांसलर हैं।
योगदान: इनके द्वारा विकसित ‘संस्कृत-स्वाध्याय’ सामग्री से करीब 20 लाख लोगों ने संस्कृत सीखी। 15 पुस्तकें लिखीं।
सम्मान: राष्ट्रपति का सम्मान पत्र (2014) और वेदव्यास पुरस्कार।

17. डॉ. आर. श्रीधर (अनुभवी रेडियो प्रसारक)
परिचय: आकाशवाणी व दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और भारत में “सामुदायिक रेडियो के जनक”।
योगदान: 2004 में अन्ना विश्वविद्यालय में देश का पहला कम्युनिटी रेडियो बनाया। 1984 में उपग्रह तकनीक से लेह और अंटार्कटिका को ‘टेली-मीट’ कार्यक्रम से जोड़ा। 18 भाषाओं में सबसे लंबा रेडियो विज्ञान धारावाहिक “मानव का विकास” बनाया। ‘ज्ञान दर्शन’ टीवी और ‘ज्ञान वाणी’ एफएम चैनल शुरू करने में मुख्य भूमिका निभाई।
सम्मान: अंतरराष्ट्रीय लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (2025, AIBD)।

18. प्रो. गम्बीर सिंह योन्जन (वनस्पतिशास्त्री व पर्यावरणविद्)
परिचय: वनस्पति विज्ञान में एमएससी और पीएचडी करने वाले पहले भारतीय नेपाली (गोरखा) विद्वान।
योगदान: दार्जिलिंग गवर्नमेंट कॉलेज में वनस्पति विज्ञान के पीजी विभाग की स्थापना की। 1978-84 के दौरान बड़े वन संरक्षण आंदोलन का नेतृत्व किया, जिससे सिंगालीला और नेओरा वैली राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना हुई। गांव में पुस्तकालय खोला और स्कूल के लिए जमीन दी।
सम्मान: INTACH द्वारा “दार्जिलिंग का जीवित खजाना” घोषित (2001) और इंदिरा वृक्ष मित्र पुरस्कार (2007)।

19. डॉ. एन. राजम् (वायलिन कलाविज्ञ)
परिचय: संगीत जगत में “सिंगिंग वायलिन” के नाम से विख्यात महान वायलिन वादक। इन्होंने वायलिन पर गायन की “गायकी अंग” तकनीक इजाद की।
योगदान: बीएचयू (BHU) के प्रदर्शन कला संकाय में 4 दशकों तक प्रोफेसर व डीन रहीं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के साथ इनकी जुगलबंदी ऐतिहासिक है। विश्व के सबसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुतियां दीं।
सम्मान: पद्म श्री (1984), पद्म भूषण (2004), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1990) और संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप (2012)।

20. हैली वार (पर्यावरणविद् व स्वदेशी ज्ञान के रक्षक)
परिचय: मेघालय के खासी समुदाय के रहने वाले और पारंपरिक बायोइंजीनियरिंग के वैश्विक प्रतीक।
योगदान: पिछले 50 से अधिक वर्षों से रबर के पेड़ों की हवाई जड़ों को आपस में बुनकर जीवित पुल यानी ‘लIVING ROOT BRIDGE’ (जिंगकिएंग जरी) बनाने की प्राचीन कला के संरक्षक हैं। इनका बनाया ‘उमकर लिविंग रूट ब्रिज’ इसका बेहतरीन उदाहरण है, जो सुदूर पहाड़ी गांवों को जोड़ता है और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को
बढ़ावा देता है।

Gujarat Vaibhav News Desk

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